महाड़ तालाब आंदोलन

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   *बाबा साहब डॉ आंबेडकर*
*1 :* हम लोग कच्चे घरों में, तम्बूओं में, झोपडियो में अमीरों की हदों से हट कर गांव से बाहर ऊँचे लोगों द्वारा शोच के हाथ धोने वाले तालाब किनारे रहते थे। अमीरों के अपने ही बनाए गए कायदे कानून के तहत हम गुलाम थे। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, बडे लोगों की बराबरी करना, अपने हक के लिए लडना, और पढाई करने का हमें कोई भी हक नहीं था।
*2:  हमारी औरतों से मनचाही मनमानी और बदसलूकीयां की जाती थी। हमें गुलाम बना कर खरीदा और बेचा जाता था। हम अधिकार विहींन थे।  ऊंची आवाज  में बोलना, आंखें उठाना, और ऊंचा सिर उठाना हमारे लिये वर्जित था। हमे बात बात पर विद्रोही बताकर दण्डित किया जाता था।*
*3 :*  हमें नीच और तुच्छ समझकर बड़े लोगों की गंदगी साफ करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। अत्याचार, अन्याय, शोषण और जुल्म सहना हमारी आदत थी। हमारी कहीं भी कोई सुनवाई नहीं होती थी।
*4 : हम दोपहर मे दर-ब-दर भटकते हुए भीख मांग कर दूसरों के टूकडों पर पलने को मजबूर थे। जानवरों के गोबर मे निकले अधपचे आनाज के दानो को धो पीसकर खाने के लिए मजबूर होते थे हम। मौत और नरक से भी बदतर थी हमारी जिन्दगियां , हमारे घर और हमारे परिवार।*
*5 :* हम दोपहर के अलावा अपने दड़बों से बाहर नहीं निकल सकते थे, ताकि हमारी परछाई किसी सवर्ण के ऊपर न पड़े। हमारा कृषि करना और आखेट करने पर पाबन्दी थी। केवल मुर्दा मवेशी का ही मांस खा सकते थे। मुर्दा मवेशी से मांस लेने के लिए हमें कुत्तों से झगड़ना पड़ता था।
*6 : हम मानव द्वारा प्रयोग किए जाने वाले तालाब से पानी नहीं पी सकते थे। पी लेने पर जिह्वा काट देने या मृत्यु दण्ड दिया जाता था। हमारे पूर्वज जानवरों के तालाब से ही पानी पी सकते थे।* हमें जानवरों से भी बदतर समझा जाता था।*तब बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने दलितों, वचितों, शोषितों को पीने के पानी से वंचित किए जाने के विरोध स्वरूप 20 मार्च 1927 को महाड़ तालाब जिसे चवदार भी कहते हैं, पर पहुंच कर भारी संख्या मे अपने अछूत भाइयों को पहली बार उस तालाब से पानी पीने का* अवसर उपलब्ध कराया।*बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने यह* प्रेरणा क्रांतिदूत संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी महाराज द्वारा महाड़ आंदोलन से 447 साल पूर्व हो रहे अछूतों के इस  शोषण के विरुद्ध इसी दिन  20 मार्च  1480 को चलाए गए “मुक्ति आंदोलन” से ली गई थी।
          *📍20 मार्च 1480📍*
  *शोषितों के लिए मुक्ति आंदोलन*
     *क्रान्तिदूत सन्त गुरू रविदास*
 उस काल में दलित, शोषित, वंचित समाज की स्थिति इससे भी बदतर थी। राजा महाराजा, आक्रमणकारी विदेशी बादशाहों से जंग लड़कर अपना वर्चस्व बचाने  में लगे थे। जिस राज्य में हिंदू राजा का राज्य होता था, वह अपने रिश्तेदार हिंदुओं को सबसे ज्यादा तरजीह देता था तथा दूसरे नंबर पर मुस्लिम लाभ उठाते थे। जबकि अछूतों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता था। जहां पर मुस्लिम बादशाहों का शासन होता था, वहां मुस्लिम बादशाह मुसलमानों को सबसे ज्यादा तरजीह देता था। तथा दूसरे नंबर पर हिंदू होते थे। इस प्रकार वहां भी अछूतों के साथ तीसरे दर्जे के नागरिकों का व्यवहार करके प्रताड़ित किया जाता था।
*इस  शोषण के विरुद्ध संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के द्वारा “दिनांक 20 मार्च 1480 को गुरु का बाग बनारस” में एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें अविभाजित भारत(लंका,नेपाल,तिब्बत,पाकिस्तान,अफगानिस्तान) से लाखों अनुयाइयों एवं साधु संतों ने भाग लिया था। गुरु रविदास जी ने हो रहे इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए राजा-महाराजाओं के विरुद्ध बिगुल बजाते हुए “मुक्ति आंदोलन”* चलाने का ऐलान किया था।
*इस दिन एकत्रित सभी लाखों लोगों( जिन्हें तालाब मे भी पानी नहीं पीने दिया जाता था) ने गंगाजल पिया और गंगा मे सामूहिक स्नान किया था।*
*बाद मे इसी “मुक्ति आन्दोलन” को रूढिवादी इतिहासकारों ने**“भक्ति आन्दोलन” के रूप मे प्रचारित किया।*

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