जगद्देव पंवार और महाराष्ट्र

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डॉ.अशोक राणा ,९३२५५१४२७७

पंवार कुल अपने स्वाभिमान तथा शूरता-वीरताके लिये पहचाना जाता है . इतिहास के पन्नोंमे इस कुलकी वैभवगाथा सुवर्णाक्षरोंमें लिखी गयी है. महाराजा भोज (इ.स.१००० से १०४७) के पश्चात जिस पंवार राजाका नाम बड़े सम्मानके साथ लिया जाता है,वह है,जगद्देव पवार. महाराजा भोज उनके चाचा थे,तथा उनके पिताका नाम उदयादित्य था. मालवा राज्यपर उदयादित्य ने इ.स.१०८० से १०८६ तक धारानगरीसे शासन किया. जगद्देव उनके तृतीय पुत्र थे. उनके प्रथम पुत्र लक्ष्मदेव तथा द्वितीय पुत्र नरवर्मन थे. महाराष्ट्रके नागपुर जिलेके रामटेक समीप नगरधन (प्राचीन नंदिवर्धन) इस स्थानको मालवाके दक्खनकी उपराजधानीका दर्जा था. उसकी सुबेदारीका वहन लक्ष्मदेव अपने पिताके कार्यकाल में ही करते आये थे. पिताके मृत्युके उपरांत लक्ष्मदेवने इ.स. १०८६ से इ.स. १०९४ तक मालवापर शासन किया. (इतिहासकारोंके अनुसार लक्ष्मदेवने कभी भी मालवापर शासन नहीं किया था.)
उदयादित्यने अपने कार्यकाल समाप्तिके बाद जगद्देवको मालवाकी सत्ता मिलनी चाहिए इस उद्देश्यसे उसको मालवाकी विरासतका एक हिस्सा जेजकभुक्ति (आजका बुंदेलखंड)का अधिकारी नियुक्त किया. इसलिए जगद्देवका ‘जज्जुगि जगदेव ’इस शब्दावलीसे उल्लेख छठवे विक्रमादित्यके हूनसी हद्गली इस स्थानसे प्राप्त कन्नड़ शिलालेखमें किया गया है. जज्जूगि का मतलब है, जेजक भुक्तिपर जिसका अधिकार है,वह. अपने मृत्युके बाद मालवाका राज्य जगद्देवको मिलना चाहिए ऐसी योजना उदयादित्यने की थी. लेकिन अपने बड़े भाईके होते हुए ‘राज्यलक्ष्मी’का स्वीकार करना यह ‘परिवित्ति’ नामक पाप है ऐसी जगद्देवकी धारणा थी. इसलिए जगद्देवने मालवाकी गद्दिका त्याग किया . परिणामवश पहले लक्ष्मदेव तथा बादमें नरवर्मनने मालवाकी गद्दी संभाली. विद्यमान महाराष्ट्रके चंद्रपूर जिलेका प्रदेश उस समय चालुक्य राजाओंके अधीन था. उसे जीतकर उन्होंने अपने राज्यमें जोड़ दिया. इसी कारण उनके चालुक्योंसे सम्बन्ध बिगड़ गए थे.
छठवे विक्रमादित्यने इ.स.१०९७ के अन्तमें मालवापर आक्रमण कर धारानगरी को उद्ध्वस्त किया. इसके कुछ अंतराल बाद विक्रमादित्य तथा जगद्देव की मुलाकात हुयी. कुछही समय बाद जगद्देवने मालवा राज्यका त्याग किया और वह दक्षिणमें आया. वहां उसका स्वागत बड़े गर्मजोशिके साथ कुन्तलाधिपति छठवे विक्रमादित्यने किया तथा उसको अपना ज्येष्ठ पुत्र मानकर अपने राज्यके एक विषयका (=विभागका)स्वामी बनाया. इस घटनाका वर्णन मेरुत्तुन्गाचार्यने अपने ‘ प्रबंध चिंतामणि ‘इस ग्रंथमें किया है. वह कहता है कि, जगद्देवके शौर्यविर्यादी गुणोंसे वश होकर परमर्दीदेव अर्थात छठवे विक्रमादित्यने उसको अपने निकट बुलाकर उसका गौरव किया और एक देशका अधिपति नियुक्त किया. उसके बाद जगद्देवने विक्रमादित्यके पक्षमें कई लडाइयोंमें हिस्सा लिया. होयसल न्रुपतिके शिलालेखमें विक्रमादित्यके सेनापतियोंमें मालवेश्वर जगद्देवका नाम दर्ज है. उसमें वीर बल्लालसे उसका जो युद्धप्रसंग हुवा उसका अति रोमहर्षक वर्णन आया है. वहां जगद्देवको ‘मालवेश्वर’ कहा गया है,इसी आधारपर वह मालवाधिपति उदयादित्यका पुत्र था यह कहा जाता है. महाराष्ट्रके विद्यमान बीड जिलेमें धर्मापुरी नामक गाँव है. वहां प्राप्त शिलालेखमें जगद्देवको मालवराज उपाधिसे सम्बोधित किया गया है.
महाराष्ट्रमें जगद्देवके तीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं. पहला शिलालेख शके १०३४ (इ.स.१११२) का यवतमाल जिलेके पुसद गावसे १० मील दुरीपर स्थित डोंगरगावमें प्राप्त हुआ था. दूसरा परभनी जिलेके रानी सावरगाँव इस स्थानमें प्राप्त हुआ तथा तीसरा बीड जीलेके धर्मापुरी गावमें तथा चवथा आजके आंध्रप्रदेशके आदिलाबाद जिलेके जयनदमें स्थित है.

रानी सावरगाव शिलालेख

इस शिलालेख का प्रथम वाचन अ.म.सिरालकरजीने कर ‘भारतीय इतिहास आणि संस्कृति’ त्रैमासिक पत्रिकाके जनवरी १९७३ के अन्कमें(पृ.४४-४९०) प्रकाशित किया है. उसके बाद डॉ.वि.भि.कोलतेजीने ‘महाराष्ट्रातील काही ताम्रपट व शिलालेख’ (महाराष्ट्र राज्य साहित्य व् संस्कृति मंडल,मुंबई,१९८७,पृ.१४४-१५०) इस ग्रंथमें उसका पुनर्वाचन किया है. इस ग्रंथमें उन्होने परमार राजा जगद्देवका परिचय दिया है. उससे इस प्रदेशमें जगद्देव पंवार का राज था यह साबित होता है. रानी सावरगाव यह स्थान धर्मपुरीके ७५ मील पूर्व दिशापर स्थित है. ‘अश्वत्थाम कवी नामक कवीने लिखा हुआ प्रशस्तिपर श्लोक इस शिलालेखमें दिखाई देता है. उसमें अपने शत्रुपर कालिदास,कर्न्नाटदंड,पाण्ड्य,जगद्देव आदि मिलकर चढ़ाई करके गए तब सिर्फ जगद्देवने अकेले शत्रुको जीता ऐसा उल्लेख है. अपने शत्रुसे भयभीत हुए कालिदास युद्धभूमिसे पलायन करने लगा,पाण्ड्य ( राजा या उसका सेनासमुह) ( पराजित होकर) पर्वतके छेदमें अर्थात बिहड़ोमें चिप गए, तथा अपनीही सेना पीछे हटने लगे तब उदयाचलके शिखरपर पूर्व दिशामें भानु भ्रमण कर रहा था ऐसी स्थितिमें अपने बाहुबलके बलपर पराक्रम करनेवाले धैर्यशील वीरश्रेष्ठ श्रीजगद्देवने कालमेघपर आरूढ़ होकर अपने लक्ष्यको जित लिया.
यहाँ जिस कलिदासका उल्लेख आया है,वह चालुक्यनृपति विक्रमादित्य (छठवा) एक सेनापती था. आहवमल्ल सोमेश्वर (पहला)का मधुवरस नामक एक सेनापति था,उसका यह पुत्र था. वह कालिदास-द्वितीय नामसे जाना जाता है.(अर्ली हिस्टरी ऑफ़ दी डेक्कन-यज्दानी.प्रो.३९६). गनेशवाडी शिलालेखमें जिसका उल्लेख आता है वह भीमनाथ प्रशस्तिका कवी ‘कालिदास दंडनायक’ इस से भिन्न है. मधुवरसपुत्र कालिदास विक्रमादित्यके कलमें विख्यस्त था.रानी सावरगाव शिलालेखमें उसीका उल्लेख है.
जिस शत्रुने जगद्देवने हराया वह होयसल नृपति वीर बल्लाल(शके १०२२ – १०३२)हो सकता है,ऐसा डॉ.कोलतेजीका मत है. जगद्देवके घोडेका नाम ‘कालमेघ’था,इसलिए जगद्देवको इस शिलालेखमें ‘ कालमेघादीरूढ़ ‘इस उपाधिसे संबोधित किया गया है.
धर्मापुरी शिलालेखमे जगद्देवका उल्लेख ‘मालवराज’ इस शब्दावलीसे किया गया है. डोंगरगाव शिलालेखमें राजत्याग करके दक्षिणमें आकर कुन्तलाधिपतिने (विक्रमादित्यने) जगद्देवका स्वागत किया था ऐसा उल्लेख है. उसमे जगद्देवने किए हुए किसीभी विजयका उल्लेख नहीं है. जयनद शिलालेखमें जगद्देवने आंध्राधिश,चक्रदुर्ग नृपति,दोरसमुद्र,गुर्जरविर जयसिंह तथा त्रिपुरीके कलचुरी नृपति कर्ण इनके साथ युद्ध करके उनको पराजित करनेका उल्लेख है. उस समय आंध्रप्रदेशपर कुलोत्तुंग चोल राजा राज करता था. चक्रदुर्गका तात्पर्य है,बस्तर प्रदेशका चक्रकोट शहर. वहां उससमय नागवंशके राजा राज करते थे. दोरसमुद्र(म्हैसूर प्रान्तका हलेबिद नामक शहर)यह होयसलोंकी राजधानी थी. वहां वीर बल्लाल उस समय राज करता था. उससे हुए युद्धमें जगद्देवने उसके सेनाका बड़े पैमानेपर विद्ध्वंस किया था. गुर्जरविर जयसिहसे भि उसने लड़ाई की थी. छठवे विक्रमादित्यकी जयसिंहसे लड़ाई होकर उसमें विक्रमादित्यका पराभव हुआ था ऐसा निर्देश मिलता है. संभवतः इसी युद्धमें विक्रमादित्यकी ओरसे लड़ते हुए जगद्देवने जयसिंहके विरुद्ध कदा सामना देकर उसकी सेनाका विध्वंस किया था. जगद्देवने जिसका पराभव किया था वह कर्ण अर्थात त्रिपुरीके कलचुरी नृपति ( गंगेयदेवका पुत्र)कर्ण है. परमार नृपति जयसिंह धारके गद्दीपर विराजमान था तब जिस तीन शत्रुओने मालवापर चढ़ाई की थी और जयसिंहको मर गिराया वह कर्ण था. इन तिनही लोगोंका उदयादित्यने अपने पिताके साथ लड़कर इस कर्णपर विजय प्राप्त की थी. धर्मापुरी शिलालेखमें उसीका निर्देश मिलता है.
जगद्देवने महाराष्ट्रमे राज करते हुए अनेक शिवालय निर्माण किए,इसीमे एक धर्मापुरी शिवालय है. इसीतरह यवतमाल शहरको लगकर लोहरा ग्रामका शिवालय,चंद्रपूर जिलेके मूल तहसीलमें मारकंडा नामक शिवालय ,(सूर्यदेवता,मार्कंडा)अमरावती जीलेमे लासूर शिवालय (लासूर मंदिर,लासूर,ता.दर्यापूर,जी.अमरावती) ( गरुडासन विष्णु) तथा चंद्रपूर जीलेमे माणिकगड जैसे अनेक किलोंका निर्माण जगद्देवने किया था. उनके अवशेष हमें बड़ी मात्रामें मिलते है.उसपर अधिक संशोधन करना जरुरी है.

@लोकायत,१३,राजर्षी शाहूनगर,पिंपळगाव रोड,यवतमाळ-४४५००१ Ashokrana.2811@gmail.com

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